Mahatma gandhi

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रामलाल आनंद महाविद्यालय

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राष्ट्रपिता महात्मा गांधी

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गांधी जी का बचपन

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मोहनदास करमचंद गांधी का जन्म 2 अक्तूबर सन् 1869 को एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था , जो कि जाति से वैश्य था।

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पिता करमचंद गांधी पोरबंदर का दीवान थे जो एक ईमानदार चरित्र के साथ एक सख्त आदमी था

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माता , पुतलिबाई। एक नम्र और धार्मिक महिला थी।

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गांधीजी की आरंभिक शिक्षा पोरबंदर में हुई। जहाँ गणित विषय में उन्होंने अपने आपको काफी कमजोर पाया। कई वर्षों के बाद उन्होंने स्वीकार किया कि वे झेंपू , शर्मीले और कम बुद्धि वाले छात्र हुआ करते थे ....

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तेरह वर्ष की आयु में मोहनदास का विवाह उनकी हम-उम्र कस्तूरबा से कर दिया गया। उस उम्र के गांधीजी के लिए शादी का अर्थ नये वत्र , फेरे लेना और साथ में खेलने तक ही सीमित था।

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इंग्लैंड में गांधी जी की शिक्षा

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1888 को गांधीजी बैरिस्टरी की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जाने के लिए रवाना हुए, उनकी माँ उन्हें विदेश भेजने के खिलाफ थीं, किंतु काफी मान-मनौवल के बाद जब वे राजी हुईं तब उन्होंने मोहनदास से यह संकल्प कराया कि वे शराब और मांस को भूलकर भी नहीं छुएँगे।

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कुछ दिनों के पश्चात गांधी ने पूरी तरह से 'जेंटलमैन` बनने का निश्चय किया। ल्रदन के सबसे फैशनेबल और महंगे दर्जियों से सूट सिलाये, महंगे घड़ी रेशमी टोपी एंव नाच-गाने की शिक्षा लेने लगे। लेकिन आत्मनिरीक्षण की उनकी आदत ने उनके मन को झकझोर दिया। तीन महीने फैशन की चकचौंध में भटकने के बाद उन्होंने फिजूलखर्ची छोड़कर मितव्ययिता का मार्ग चुना

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तीन वर्षों के पश्चात गांधीजी 1891 में बैरिस्टर बनकर स्वदेश लौटे।

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व्यावसायिक जीवन की शुरूआत

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कुछ समय राजकोट में बिताने के पश्चात् गांधीजी ने बम्बई आकर वकालत करने लगे. किन्तु यहाँ रिश्वत, झूठ, साजिश और वकीलों की घटिया दलीलों से उन्हें घृणा होने लगी। फिर उन्होने दक्षिण अफ्रीका जाने का निश्चय किया।

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दक्षिण अफ्रीका में गोरा एंव काले के बीच हो रहे अपमान जनक भेद –भाव के विरुद्ध गांधी जी ने अहिंशा पूर्वक संघर्ष शुरू किया अन्तः गांधीजी काले-गोरे का भेद मिटाकर वापस भारत लोटें

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भारत में सत्याग्रह की शुरूआत

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1915 में गांधीजी अहमदाबाद स्थित साबरमती नदी के तट के पास साबरमती आश्रम बनाया। यहीं से गांधी जी ने सत्य, प्रेम, अहिंसा, अपरिग्रह और अस्तेय के मार्ग पर चलने का संकल्प लिया.

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गांधीजी 4 फरवरी 1916 पहली बार सार्वजनिक सभा में भाषण दिये। उन्होने इस अवसर पर एक हिन्दू राष्ट्रीय विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में अंग्रेजी भाषा में बोलने की अपनी विवशता पर खेद प्रकट करते हुए उन्होंने भाषण की शुरूआत की।

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1917 में बिहार की शहर चंपारण में नील की खेती करने वाले किसानों पर हो रहे अत्याचार को लेकर इंडिगो वृक्षारोपण कर एक आंदोलन, शुभारंभ किया . ब्रिटिश सरकार को किसानों मांगों को स्वीकार करने के लिए मजबूर किया. उनकी जीत ने उसे एक राष्ट्रीय नेता के रूप में स्थापित किया है.

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ब्रिटिश कानून के कारण गरीब किसान अपनी नमक की खेती नहीं कर पर रहे थे। इस कानून को भंग करने के लिए गांधी जी ने 6 अप्रैल 1930 की सुबह मुठ्ठी भर नमक उठाकर 'नमक कानून' को भंग कर दिया। देश के कोने-कोने में गांधीजी का अनुकरण करते हुए इस कानून को लोगों ने तोड़ा। पुरुष-महिलाएँ, किसानों ने हजारों की संख्या में जुलूस निकाले।

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1920 में, महात्मा गांधी असहयोग आंदोलन का शुभारंभ किया. सरकारी सेवा का बहिष्कार, विधायिकाओं, स्कूलों, कॉलेजों और करों का भुगतान न देने आदि शामिल था . आंदोलन सफल रहा था, लेकिन उत्तर प्रदेश में चौरी चौरा में हिंसा की एक छोटी सी घटना को गांधी आन्दोलन वापस ले लिया

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1931 में गांधी जी कांग्रेस के एक प्रतिनिधि के रूप में द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने लंदन गए. वह आधे नग्न विद्रोहात्मक फकीर 'के रूप में प्रसिद्ध हो गया.

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गोलमेज सम्मेलन से वापस लोटने के पश्चात गांधी जी ने विदेशी वस्तुओ का बहिष्कार किया एंव स्वदेशी बस्तुओं के प्रयोग पर बल दिया उन्होने खुद अपने कपड़े बुनना प्रारंभ किया

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' भारत छोड़ो आंदोलन '

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1942 में गांधी जी के निर्देशन में कांग्रेस पार्टी ने उनके भारत छोड़ो आंदोलन का शुभारंभ किया, और ब्रिटिश सरकार को एहसास दिलाया की अब वह लंबे समय के लिए भारत पर शासन जारी नहीं रख सकता .

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1945 में मुहम्मद अली जिन्ना द्वारा अलग मुस्लिम राष्ट्र की माँग की जा रही थी तो गांधीजी ने मुहम्मद अली जिन्ना से अनुरोध करते हुए कहा - यदि तुम चाहो तो मेरे टुकड़े कर लो, पर भारत को दो हिस्सों में न बाँटो।

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7 नवंबर 1946 से 2 मार्च 1947 तक गांधीजी बिहार के नोआखली गाँव में रहें यहाँ उन्होने गरीब असहाय एंव बीमार लोगो की सेवा किया एंव लोगो को अपने ज़िम्मेदारी का एहसास दिलाया। यह गांधीजी का ही प्रभाव था कि एक धर्म की महिलाएँ दूसरे धर्म के लोगों के इलाज के लिए अपने गहने तक उतार कर दे रहीं थी।

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लॉर्ड माउंटबेटन ने मई 1947 में गांधीजी को दिल्ली बुलाया। जहाँ कांग्रेसी नेताओं के साथ जिन्ना भी उपस्थित थे। जिन्ना मुस्लिमों के लिए अलग राष्ट्र की माँग पर अड़े थे। 15 अगस्त 1947 को देश स्वतंत्र हुआ। गांधीजी ने इस दिन आयोजित किये गये समारोह में भाग न लेकर कलकत्ता जाना उचित समझा ।

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देश को मिली आजादी , पर गांधीजी नहीं रहे!

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30 जनवरी, 1948, के दिन बापू को नाथू राम गोडसे द्वारा गोली मार दी थी, जब वह दिल्ली में अपने दैनिक प्रार्थना सभा में भाग लेने के लिए जा रहे थे. उनके अंतिम शब्द थे 'हे राम "

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नेहरू ने दुखी, करूणाभरी आवाज में रेडियो पर कुछ यूँ कहा – "वह ज्योति चली गई जिसने लोगों के अंधकारमय जीवन को रोशनी दी।चारों ओर अंधेरा हो गया है। जिन्हें हम 'बापू' कहते थे, देश के राष्ट्रपिता अब नहीं रहें... हमारे सिर से उनका साया चला गया । वह जीवन जीने का मंत्र देने वाली ज्योति थी। उस रोशनी ने देश के कोने-कोने में उजाला फैलाया। संपूर्ण विश्व ने इसे देखा। उनके सत्य, प्रेम, अहिंसा के दिपक हमेशा इस देश के लोगों को अपनी रोशनी देते रहेंगे.....।"

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गांधी जी के याद में हर साल 2 अक्टूबर को गांधी जयंती मानते हैं साथ ही इस दिन को पूरे विश्व में अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता.

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गांधी जी के अनमोल वचन

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वास्तविक सोन्दर्य ह्रदय की पवित्रता में है अहिंसा ही धर्म है , वही जिंदगी का एक रास्ता है

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किसी राष्ट्र की संस्कृति उसके लोगों के दिलों और आत्माओं में बसती है

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कोई भी संस्कृति जीवित नहीं रह सकती यदि वह अपने को अन्य से पृथक रखने का प्रयास करे।

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प्रकृति मानव की अवशकता को पूरी सकती है , लोभों को नहीं

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