हिंदी व्याकरण-त्रिलोक नाथ पांडेय

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Trilok Nath Pandey has written several stories,poems,articles both in hindi, english and bhojpuri and dozen of them are published.By profession he is a teacher.He takes keen interest in dramatization,recitations,debate,public speaking.Have won certificates and prizes for speeches, recitation, creative writing, theatre at school and college level. • Poems and stories written by me have been published in newspaper like Sadinama, Jansata, Sanmarg,SIKKIM EXPRESS.He always look for new methods of teaching.

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आशा है कि n’kZd , oa ikBdx.k इसका समुचित लाभ उठा पायेंगे । fganh O;kdj.k f= yksd ukFk ikaMs ; ,e -, fganh

भाषा, व्याकरण और बोली:

भाषा, व्याकरण और बोली परिभाषा - भाषा अभिव्यक्ति का एक ऐसा समर्थ साधन है जिसके द्वारा मनुष्य अपने विचारों को दूसरों पर प्रकट कर सकता है और दूसरों के विचार जाना सकता है । संसार में अनेक भाषाएँ हैं । जैसे-हिन्दी,संस्कृत,अंग्रेजी , बँगला,गुजराती,पंजाबी,उर्दू , तेलुगु , मलयालम , कन्नड ़, फ्रैंच , चीनी , जर्मन इत्यादि ।

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भाषा के प्रकार - भाषा दो प्रकार की होती है - 1. मौखिक भाषा। 2. लिखित भाषा। आमने-सामने बैठे व्यक्ति परस्पर बातचीत करते हैं अथवा कोई व्यक्ति भाषण आदि द्वारा अपने विचार प्रकट करता है तो उसे भाषा का मौखिक रूप कहते हैं । जब व्यक्ति किसी दूर बैठे व्यक्ति को पत्र द्वारा अथवा पुस्तकों एवं पत्र-पत्रिकाओं में लेख द्वारा अपने विचार प्रकट करता है तब उसे भाषा का लिखित रूप कहते हैं ।

व्याकरण :

व्याकरण मनुष्य मौखिक एवं लिखित भाषा में अपने विचार प्रकट कर सकता है और करता रहा है किन्तु इससे भाषा का कोई निश्चित एवं शुद्ध स्वरूप स्थिर नहीं हो सकता । भाषा के शुद्ध और स्थायी रूप को निश्चित करने के लिए नियमबद्ध योजना की आवश्यकता होती है और उस नियमबद्ध योजना को हम व्याकरण कहते हैं ।

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परिभाषा - व्याकरण वह शास्त्र है जिसके द्वारा किसी भी भाषा के शब्दों और वाक्यों के शुद्ध स्वरूपों एवं शुद्ध प्रयोगों का विशद ज्ञान कराया जाता है । भाषा और व्याकरण का संबंध - कोई भी मनुष्य शुद्ध भाषा का पूर्ण ज्ञान व्याकरण के बिना प्राप्त नहीं कर सकता । अतः भाषा और व्याकरण का घनिष्ठ संबंध हैं वह भाषा में उच्चारण , शब्द-प्रयोग , वाक्य-गठन तथा अर्थों के प्रयोग के रूप को निश्चित करता है ।

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व्याकरण के विभाग - व्याकरण के चार अंग निर्धारित किये गये हैं - 1. वर्ण-विचार । 2. शब्द-विचार । 3. पद-विचार । 4. वाक्य विचार ।

बोली :

बोली भाषा का क्षेत्रीय रूप बोली कहलाता है । अर्थात् देश के विभिन्न भागों में बोली जाने वाली भाषा बोली कहलाती है और किसी भी क्षेत्रीय बोली का लिखित रूप में स्थिर साहित्य वहाँ की भाषा कहलाता है ।

लिपि :

लिपि किसी भी भाषा के लिखने की विधि को ‘ लिपि ’ कहते हैं । हिन्दी और संस्कृत भाषा की लिपि का नाम देवनागरी है । अंग्रेजी भाषा की लिपि ‘ रोमन ’ , उर्दू भाषा की लिपि फारसी , और पंजाबी भाषा की लिपि गुरुमुखी है ।

साहित्य :

साहित्य ज्ञान-राशि का संचित कोश ही साहित्य है । साहित्य ही किसी भी देश , जाति और वर्ग को जीवंत रखने का- उसके अतीत रूपों को दर्शाने का एकमात्र साक्ष्य होता है । यह मानव की अनुभूति के विभिन्न पक्षों को स्पष्ट करता है और पाठकों एवं श्रोताओं के हृदय में एक अलौकिक अनिर्वचनीय आनंद की अनुभूति उत्पन्न करता है ।

वर्ण-विचार :

वर्ण-विचार परिभाषा - हिन्दी भाषा में प्रयुक्त सबसे छोटी ध्वनि वर्ण कहलाती है । जैसे -अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, क् , ख् आदि ।

वर्णमाला :

वर्णमाला वर्णों के समुदाय को ही वर्णमाला कहते हैं । हिन्दी वर्णमाला में 44 वर्ण हैं । उच्चारण और प्रयोग के आधार पर हिन्दी वर्णमाला के दो भेद किए गए हैं - 1. स्वर 2. व्यंजन

स्वर :

स्वर जिन वर्णों का उच्चारण स्वतंत्र रूप से होता हो और जो व्यंजनों के उच्चारण में सहायक हों वे स्वर कहलाते है । ये संख्या में ग्यारह हैं - अ, आ, इ, ई, उ, ऊ, ऋ, ए, ऐ, ओ, औ। उच्चारण के समय की दृष्टि से स्वर के तीन भेद किए गए हैं - 1. ह्रस्व स्वर । 2. दीर्घ स्वर । 3. प्लुत स्वर ।

ह्रस्व स्वर :

ह्रस्व स्वर जिन स्वरों के उच्चारण में कम-से-कम समय लगता हैं उन्हें ह्रस्व स्वर कहते हैं । ये चार हैं - अ, इ, उ, ऋ। इन्हें मूल स्वर भी कहते हैं ।

दीर्घ स्वर :

दीर्घ स्वर जिन स्वरों के उच्चारण में ह्रस्व स्वरों से दुगुना समय लगता है उन्हें दीर्घ स्वर कहते हैं । ये हिन्दी में सात हैं - आ, ई, ऊ, ए, ऐ, ओ, औ। विशेष - दीर्घ स्वरों को ह्रस्व स्वरों का दीर्घ रूप नहीं समझना चाहिए । यहाँ दीर्घ शब्द का प्रयोग उच्चारण में लगने वाले समय को आधार मानकर किया गया है ।

प्लुत स्वर:

प्लुत स्वर जिन स्वरों के उच्चारण में दीर्घ स्वरों से भी अधिक समय लगता है उन्हें प्लुत स्वर कहते हैं । प्रायः इनका प्रयोग दूर से बुलाने में किया जाता है ।

मात्राएँ :

मात्राएँ स्वरों के बदले हुए स्वरूप को मात्रा कहते हैं स्वरों की मात्राएँ निम्नलिखित हैं - स्वर मात्राएँ शब्द अ × कम आ ा काम इ ि किसलय ई ी खीर उ ु गुलाब ऊ ू भूल ऋ ृ तृण ए े केश ऐ ै है ओ ो चोर औ ौ चौखट अ वर्ण ( स्वर ) की कोई मात्रा नहीं होती । व्यंजनों का अपना स्वरूप निम्नलिखित हैं - क् च् छ् ज् झ् त् थ् ध् आदि । अ लगने पर व्यंजनों के नीचे का ( हल ) चिह्न हट जाता है । तब ये इस प्रकार लिखे जाते हैं - क च छ ज झ त थ ध आदि ।

व्यंजन :

व्यंजन जिन वर्णों के पूर्ण उच्चारण के लिए स्वरों की सहायता ली जाती है वे व्यंजन कहलाते हैं । अर्थात व्यंजन बिना स्वरों की सहायता के बोले ही नहीं जा सकते । ये संख्या में 33 हैं । इसके निम्नलिखित तीन भेद हैं - 1. स्पर्श 2. अंतःस्थ 3. ऊष्म

स्पर्श :

स्पर्श इन्हें पाँच वर्गों में रखा गया है और हर वर्ग में पाँच-पाँच व्यंजन हैं । हर वर्ग का नाम पहले वर्ग के अनुसार रखा गया है जैसे - कवर्ग - क् ख् ग् घ् ड़् चवर्ग - च् छ् ज् झ् ञ् टवर्ग - ट् ठ् ड् ढ् ण् ( ड़् ढ़् ) तवर्ग - त् थ् द् ध् न् पवर्ग - प् फ् ब् भ् म्

अंतःस्थ :

अंतःस्थ ये निम्नलिखित चार हैं - य् र् ल् व्

ऊष्म :

ऊष्म ये निम्नलिखित चार हैं - श् ष् स् ह्   वैसे तो जहाँ भी दो अथवा दो से अधिक व्यंजन मिल जाते हैं वे संयुक्त व्यंजन कहलाते हैं , किन्तु देवनागरी लिपि में संयोग के बाद रूप-परिवर्तन हो जाने के कारण इन तीन को गिनाया गया है । ये दो-दो व्यंजनों से मिलकर बने हैं । जैसे-क्ष = क्+ष अक्षर , ज्ञ = ज्+ञ ज्ञान , त्र = त्+र नक्षत्र कुछ लोग क्ष् त्र् और ज्ञ् को भी हिन्दी वर्णमाला में गिनते हैं , पर ये संयुक्त व्यंजन हैं । अतः इन्हें वर्णमाला में गिनना उचित प्रतीत नहीं होता ।

अनुस्वार :

अनुस्वार इसका प्रयोग पंचम वर्ण के स्थान पर होता है । इसका चिन्ह (ं) है । जैसे - सम्भव = संभव , सञ्जय = संजय , गड़्गा = गंगा ।

विसर्ग :

विसर्ग इसका उच्चारण ह् के समान होता है । इसका चिह्न (:) है । जैसे-अतः , प्रातः ।

चंद्रबिंदु :

चंद्रबिंदु जब किसी स्वर का उच्चारण नासिका और मुख दोनों से किया जाता है तब उसके ऊपर चंद्रबिंदु (ँ) लगा दिया जाता है । यह अनुनासिक कहलाता है । जैसे-हँसना , आँख । हिन्दी वर्णमाला में 11 स्वर तथा 33 व्यंजन गिनाए जाते हैं , परन्तु   इनमें ड़् , ढ़् अं तथा अः जोड़ने पर हिन्दी के वर्णों की कुल संख्या 48 हो जाती है ।

हलंत :

हलंत जब कभी व्यंजन का प्रयोग स्वर से रहित किया जाता है तब उसके नीचे एक तिरछी रेखा (्) लगा दी जाती है । यह रेखा हल कहलाती है । हलयुक्त व्यंजन हलंत वर्ण कहलाता है । जैसे-विद् या ।

वर्णों के उच्चारण-स्थान :

वर्णों के उच्चारण-स्थान मुख के जिस भाग से जिस वर्ण का उच्चारण होता है उसे उस वर्ण का उच्चारण स्थान कहते हैं ।

उच्चारण स्थान तालिका :

उच्चारण स्थान तालिका क्र -म वर्ण उच्चारण श्रेणी 1. अ आ क् ख् ग् घ् ड़् ह् विसर्ग कंठ और जीभ का निचला भाग कंठस्थ 2. इ ई च् छ् ज् झ् ञ् य् श तालु और जीभ तालव्य 3. ऋ ट् ठ् ड् ढ् ण् ड़् ढ़् र् ष् मूर्धा और जीभ मूर्धन्य 4. त् थ् द् ध् न् ल् स् दाँत और जीभ दंत्य 5. उ ऊ प् फ् ब् भ् म दोनों होंठ ओष्ठ्य 6. ए ऐ कंठ तालु और जीभ कंठतालव्य 7. ओ औ दाँत जीभ और होंठ कंठोष्ठ्य 8. व् दाँत जीभ और होंठ दंतोष्

शब्द-विचार:

शब्द-विचार परिभाषा - एक या अधिक वर्णों से बनी हुई स्वतंत्र सार्थक ध्वनि शब्द कहलाता है । जैसे - एक वर्ण से निर्मित शब्द -न ( नहीं ) व ( और ) अनेक वर्णों से निर्मित शब्द-कुत्ता , शेर,कमल , नयन , प्रासाद , सर्वव्यापी , परमात्मा ।

शब्द-भेद :

शब्द-भेद व्युत्पत्ति ( बनावट ) के आधार पर शब्द-भेद - व्युत्पत्ति ( बनावट ) के आधार पर शब्द के निम्नलिखित तीन भेद हैं - 1. रूढ ़ 2. यौगिक 3. योगरूढ ़

रूढ़ :

रूढ ़ जो शब्द किन्हीं अन्य शब्दों के योग से न बने हों और किसी विशेष अर्थ को प्रकट करते हों तथा जिनके टुकड़ों का कोई अर्थ नहीं होता , वे रूढ ़ कहलाते हैं । जैसे-कल , पर । इनमें क, ल, प, र का टुकड़े करने पर कुछ अर्थ नहीं हैं । अतः ये निरर्थक हैं ।

यौगिक:

यौगिक जो शब्द कई सार्थक शब्दों के मेल से बने हों,वे यौगिक कहलाते हैं । जैसे-देवालय = देव+आलय , राजपुरुष = राज+पुरुष , हिमालय = हिम+आलय , देवदूत = देव+दूत आदि । ये सभी शब्द दो सार्थक शब्दों के मेल से बने हैं ।

योगरूढ़ :

योगरूढ ़ शब्द , जो यौगिक तो हैं , किन्तु सामान्य अर्थ को न प्रकट कर किसी विशेष अर्थ को प्रकट करते हैं , योगरूढ ़ कहलाते हैं । जैसे-पंकज , दशानन आदि । पंकज = पंक+ज ( कीचड ़ में उत्पन्न होने वाला ) सामान्य अर्थ में प्रचलित न होकर कमल के अर्थ में रूढ ़ हो गया है । अतः पंकज शब्द योगरूढ ़ है । इसी प्रकार दश ( दस ) आनन ( मुख ) वाला रावण के अर्थ में प्रसिद्ध है ।

उत्पत्ति के आधार पर शब्द-भेद :

उत्पत्ति के आधार पर शब्द-भेद उत्पत्ति के आधार पर शब्द के निम्नलिखित चार भेद हैं - 1 . तत्सम - जो शब्द संस्कृत भाषा से हिन्दी में बिना किसी परिवर्तन के ले लिए गए हैं वे तत्सम कहलाते हैं । जैसे-अग्नि , क्षेत्र , वायु , रात्रि , सूर्य आदि । 2. तद्भव - जो शब्द रूप बदलने के बाद संस्कृत से हिन्दी में आए हैं वे तद्भव कहलाते हैं । जैसे-आग ( अग्नि ), खेत ( क्षेत्र ), रात ( रात्रि ), सूरज ( सूर्य ) आदि । 3. देशज - जो शब्द क्षेत्रीय प्रभाव के कारण परिस्थिति व आवश्यकतानुसार बनकर प्रचलित हो गए हैं वे देशज कहलाते हैं । जैसे-पगड़ी , गाड़ी , थैला , पेट , खटखटाना आदि ।

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4 . विदेशी या विदेशज - विदेशी जातियों के संपर्क से उनकी भाषा के बहुत से शब्द हिन्दी में प्रयुक्त होने लगे हैं । ऐसे शब्द विदेशी अथवा विदेशज कहलाते हैं । जैसे-स्कूल , अनार , आम , कैंची,अचार , पुलिस , टेलीफोन , रिक्शा आदि । ऐसे कुछ विदेशी शब्दों की सूची नीचे दी जा रही है । अंग्रेजी - कॉलेज , पैंसिल , रेडियो , टेलीविजन , डॉक्टर , लैटरबक्स , पैन , टिकट , मशीन , सिगरेट , साइकिल , बोतल आदि । फारसी - अनार,चश्मा , जमींदार , दुकान , दरबार , नमक , नमूना , बीमार , बरफ , रूमाल , आदमी , चुगलखोर , गंदगी , चापलूसी आदि ।

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अरबी - औलाद , अमीर , कत्ल , कलम , कानून , खत , फकीर , रिश्वत , औरत , कैदी , मालिक , गरीब आदि । तुर्की - कैंची , चाकू , तोप , बारूद , लाश , दारोगा , बहादुर आदि । पुर्तगाली - अचार , आलपीन , कारतूस , गमला , चाबी , तिजोरी , तौलिया , फीता , साबुन , तंबाकू , कॉफी , कमीज आदि । फ्रांसीसी - पुलिस , कार्टून , इंजीनियर , कर्फ्यू , बिगुल आदि । चीनी - तूफान , लीची , चाय , पटाखा आदि । यूनानी - टेलीफोन , टेलीग्राफ , ऐटम , डेल्टा आदि । जापानी - रिक्शा आदि ।

प्रयोग के आधार पर शब्द-भेद :

प्रयोग के आधार पर शब्द-भेद प्रयोग के आधार पर शब्द के निम्नलिखित आठ भेद है - 1. संज्ञा 2. सर्वनाम 3. विशेषण 4. क्रिया 5. क्रिया-विशेषण 6. संबंधबोधक 7. समुच्चयबोधक 8. विस्मयादिबोधक इन उपर्युक्त आठ प्रकार के शब्दों को भी विकार की दृष्टि से दो भागों में बाँटा जा सकता है - 1. विकारी 2. अविकारी

विकारी शब्द :

विकारी शब्द जिन शब्दों का रूप-परिवर्तन होता रहता है वे विकारी शब्द कहलाते हैं । जैसे-कुत्ता , कुत्ते , कुत्तों , मैं मुझे,हमें अच्छा , अच्छे खाता है , खाती है , खाते हैं । इनमें संज्ञा , सर्वनाम , विशेषण और क्रिया विकारी शब्द हैं ।

अविकारी शब्द:

अविकारी शब्द जिन शब्दों के रूप में कभी कोई परिवर्तन नहीं होता है वे अविकारी शब्द कहलाते हैं । जैसे-यहाँ , किन्तु , नित्य , और , हे अरे आदि । इनमें क्रिया-विशेषण , संबंधबोधक , समुच्चयबोधक और विस्मयादिबोधक आदि हैं ।

अर्थ की दृष्टि से शब्द-भेद :

अर्थ की दृष्टि से शब्द-भेद अर्थ की दृष्टि से शब्द के दो भेद हैं - सार्थक 2. निरर्थक

सार्थक शब्द:

सार्थक शब्द जिन शब्दों का कुछ -न- कुछ अर्थ हो वे शब्द सार्थक शब्द कहलाते हैं । जैसे-रोटी , पानी , ममता , डंडा आदि ।

निरर्थक शब्द :

निरर्थक शब्द जिन शब्दों का कोई अर्थ नहीं होता है वे शब्द निरर्थक कहलाते हैं । जैसे-रोटी-वोटी , पानी-वानी , डंडा-वंडा इनमें वोटी , वानी , वंडा आदि निरर्थक शब्द हैं । विशेष - निरर्थक शब्दों पर व्याकरण में कोई विचार नहीं किया जाता है ।

पद-विचार :

पद-विचार सार्थक वर्ण-समूह शब्द कहलाता है , पर जब इसका प्रयोग वाक्य में होता है तो वह स्वतंत्र नहीं रहता बल्कि व्याकरण के नियमों में बँध जाता है और प्रायः इसका रूप भी बदल जाता है । जब कोई शब्द वाक्य में प्रयुक्त होता है तो उसे शब्द न कहकर पद कहा जाता है । हिन्दी में पद पाँच प्रकार के होते हैं - 1. संज्ञा 2. सर्वनाम 3. विशेषण 4. क्रिया 5. अव्यय

संज्ञा :

संज्ञा किसी व्यक्ति , स्थान , वस्तु आदि तथा नाम के गुण , धर्म , स्वभाव का बोध कराने वाले शब्द संज्ञा कहलाते हैं । जैसे-श्याम , आम , मिठास , हाथी आदि । संज्ञा के प्रकार - संज्ञा के तीन भेद हैं - 1. व्यक्तिवाचक संज्ञा । 2. जातिवाचक संज्ञा । 3. भाववाचक संज्ञा ।

व्यक्तिवाचक संज्ञा :

व्यक्तिवाचक संज्ञा जिस संज्ञा शब्द से किसी विशेष , व्यक्ति , प्राणी , वस्तु अथवा स्थान का बोध हो उसे व्यक्तिवाचक संज्ञा कहते हैं । जैसे-जयप्रकाश नारायण , श्रीकृष्ण , रामायण , ताजमहल , कुतुबमीनार , लालकिला हिमालय आदि ।

जातिवाचक संज्ञा :

जातिवाचक संज्ञा जिस संज्ञा शब्द से उसकी संपूर्ण जाति का बोध हो उसे जातिवाचक संज्ञा कहते हैं । जैसे-मनुष्य , नदी , नगर , पर्वत , पशु , पक्षी , लड़का , कुत्ता , गाय , घोड़ा , भैंस , बकरी , नारी , गाँव आदि ।

भाववाचक संज्ञा :

भाववाचक संज्ञा जिस संज्ञा शब्द से पदार्थों की अवस्था , गुण-दोष , धर्म आदि का बोध हो उसे भाववाचक संज्ञा कहते हैं । जैसे-बुढ़ापा , मिठास , बचपन , मोटापा , चढ़ाई , थकावट आदि । विशेष वक्तव्य - कुछ विद्वान अंग्रेजी व्याकरण के प्रभाव के कारण संज्ञा शब्द के दो भेद और बतलाते हैं - 1. समुदायवाचक संज्ञा । 2. द्रव्यवाचक संज्ञा ।

समुदायवाचक संज्ञा:

समुदायवाचक संज्ञा जिन संज्ञा शब्दों से व्यक्तियों , वस्तुओं आदि के समूह का बोध हो उन्हें समुदायवाचक संज्ञा कहते हैं । जैसे-सभा , कक्षा , सेना , भीड ़, पुस्तकालय दल आदि ।

द्रव्यवाचक संज्ञा:

द्रव्यवाचक संज्ञा जिन संज्ञा-शब्दों से किसी धातु , द्रव्य आदि पदार्थों का बोध हो उन्हें द्रव्यवाचक संज्ञा कहते हैं । जैसे-घी , तेल , सोना , चाँदी,पीतल , चावल , गेहूँ , कोयला , लोहा आदि ।

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इस प्रकार संज्ञा के पाँच भेद हो गए , किन्तु अनेक विद्वान समुदायवाचक और द्रव्यवाचक संज्ञाओं को जातिवाचक संज्ञा के अंतर्गत ही मानते हैं , और यही उचित भी प्रतीत होता है । भाववाचक संज्ञा बनाना - भाववाचक संज्ञाएँ चार प्रकार के शब्दों से बनती हैं ।

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जातिवाचक संज्ञाओं से :- दास दासता नारी नारीत्व पंडित पांडित्य   बच्चा बचपन बंधु बंधुत्व बालक बालकपन क्षत्रिय क्षत्रियत्व मित्र मित्रता पुरुष पुरुषत्व   ब्राह्मण ब्राह्मणत्व प्रभु प्रभुता पशु पशुता,पशुत्व  

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सर्वनाम से :- अपना अपनापन , अपनत्व निज निजत्व , निजता पराया परायापन   स्व स्वत्व सर्व सर्वस्व अहं अहंकार मम ममत्व,ममता

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विशेषण से :- मीठा मिठास   चतुर चातुर्य , चतुराई मधुर माधुर्य   सुंदर सौंदर्य , सुंदरता निर्बल निर्बलता सफेद सफेदी हरा हरियाली   सफल सफलता प्रवीण प्रवीणता   मैला मैल निपुण निपुणता   खट्टा खटास

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क्रिया से :- खेलना खेल   देखना-भालना देख-भाल थकना थकावट   रहना-सहना रहन-सहन   लिखना लेख , लिखाई उड़ना उड़ान हँसना हँसी उतरना उतराई लेना-देना लेन-देन कमाना कमाई   पढ़ना पढ़ाई मुसकाना मुसकान मिलना मेल चढ़ना चढ़ाई    

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