HINDI PPT ON PAD MADE BY G.MOTHY

Views:
 
Category: Education
     
 

Presentation Description

PPT ON SURDAS KA PAD. It is a ppt on Kendriya Vidyalaya Hindi syllabus poem. The information is written in hindi using Hindi scripting language. It also includes the complete peom with meaning. It is made attractive with the use of images. It is uploaded in the view to help the students to get a start on making hindi ppt.

Comments

Presentation Transcript

Slide 2:

नमस्कार

हिन्दी प्रयोजनाकार्य :

हिन्दी प्रयोजनाकार्य विषय : सूरदास के पद के न्द्री य विद्यालय – 1 उप्प्ल

Slide 4:

सूरदास

Slide 6:

कृष्ण भक्ति की अजस्र धारा को प्रवाहित करने वाले भक्त कवियों में   सूरदास   का नाम सर्वोपरि है। हिन्दी साहित्य में भगवान   श्रीकृष्ण   के अनन्य उपासक और   ब्रजभाषा   के श्रेष्ठ कवि महात्मा सूरदास   हिंदी साहित्य   के   सूर्य   माने जाते हैं। हिंदी कविता कामिनी के इस कमनीय कांत ने हिंदी भाषा को समृद्ध करने में जो योगदान दिया है , वह अद्वितीय है। सूरदास हिन्दी साहित्य में   भक्ति काल   के सगुण भक्ति शाखा के कृष्ण - भक्ति उपशाखा के महान कवि हैं।   हिन्ढी साहित्य   में कृष्ण - भक्ति की अजस्र धारा को प्रवाहित करने वाले भक्त कवियों में महाकवि सूरदास का नाम अग्रणी है।

Slide 7:

जीवन परिचय

Slide 8:

सूरदास का जन्म १४७८ ईस्वी में रुनकता नामक गांव में हुआ। यह गाँव   मथुरा - आगरा   मार्ग के किनारे स्थित है। कुछ विद्वानों का मत है कि सूर का जन्म सीही नामक ग्राम में एक निर्धन सारस्वत ब्राह्मण परिवार में हुआ था। बाद में ये   आगरा   और   मथुरा   के बीच गऊघाट पर आकर रहने लगे थे। सूरदास के पिता रामदास गायक थे। सूरदास के जन्मांध होने के विषय में मतभेद है। प्रारंभ में सूरदास आगरा के समीप गऊघाट पर रहते थे। वहीं उनकी भेंट श्री   वल्लभाचार्य   से हुई और वे उनके शिष्य बन गए। वल्लभाचार्य ने उनको पुष्टिमार्ग में दीक्षित कर के कृष्णलीला के पद गाने का आदेश दिया। सूरदास की मृत्यु गोवर्धन के निकट पारसौली ग्राम में १५८० ईस्वी में हुई।

Slide 9:

सूरदास की जन्मतिथि एवं जन्मस्थान के विषय में विद्वानों में मतभेद है। - " साहित्य लहरी ' सूर की लिखी रचना मानी जाती है। इसमें साहित्य लहरी के रचना - काल के सम्बन्ध में निम्न पद मिलता है - मुनि पुनि के रस लेख। दसन गौरीनन्द को लिखि सुवल संवत् पेख ।। इसका अर्थ विद्वानों ने संवत् १६०७ वि० माना है , अतएव " साहित्य लहरी ' का रचना काल संवत् १६०७ वि० है। इस ग्रन्थ से यह भी प्रमाण मिलता है कि सूर के गुरु श्री बल्लभाचार्य थे।

Slide 10:

सूरदास का जन्म सं० १५३५ वि० के लगभग ठहरता है , क्योंकि बल्लभ सम्प्रदाय में ऐसी मान्यता है कि बल्लभाचार्य सूरदास से दस दिन बड़े थे और बल्लभाचार्य का जन्म उक्त संवत् की वैशाख् कृष्ण एकादशी को हुआ था। इसलिए सूरदास की जन्म - तिथि वैशाख शुक्ला पंचमी , संवत् १५३५ वि० समीचीन जान पड़ती है। अनेक प्रमाणों के आधार पर उनका मृत्यु संवत् १६२० से १६४८ वि० के मध्य स्वीकार किया जाता है।   रामचन्द्र शुक्ल   जी के मतानुसार सूरदास का जन्म संवत् १५४० वि० के सन्निकट और मृत्यु संवत् १६२० वि० के आसपास माना जाता है।

Slide 12:

पद

Slide 13:

पद

Slide 14:

श्री कृष्ण जी के कहने पर उद्धव गोपियों को समझाने के लिए वृन्दावन जाते हैं। जहाँ उनकी गोपियों से बात होती है। गोपियाँ उद्धव की बात सुनकर बड़ी हैरान होती हैं। वे उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव तुम तो बड़े भाग्यशाली हो जो श्री कृष्ण के साथ रहते हुए भी उनके प्रेम से अछूते हो। तुम तो हमेशा उनके साथ रहते हो फिर भी तुम्हें उनसे प्रेम नहीं हुआ। वे कहती हैं कि तुम्हारी स्थिति वैसे ही है, जैसे जल के भीतर रहते हुए भी कमल के पत्ते पर पानी की एक बूंद नहीं ठहर पाती है। वे आगे कहती हैं कि तेल से भरी गगरी पानी में रहते हुए भी उसके प्रभाव से अछूती रही है। तुम्हारी हालत भी बिलकुल वैसी ही है। तुम पर उनके प्रेम का कोई प्रभाव नहीं पड़ा है। वे कहती हैं तुम्हारी श्री कृष्ण के रूप पर कभी दृष्टि नहीं पड़ी है तो तुम कैसे उनके प्रेम रूपी नदी में अपने पैर रखोगे। हम तो भोली व अबला गोपियाँ हैं जो उनके प्रेम में डूबी हुई हैं। हमारी तो उसी प्रकार की स्थिति है जैसे चींटियाँ गुड़ से चिपकी रहती है और कहीं नहीं जाती हैं। भाव यह है कि हम श्री कृष्ण के प्रेम में इतना रम गई हैं कि उनके सिवाए हमें कुछ और दिखाई नहीं देता। हम तो कृष्णमय हो गई हैं। भाव:

Slide 16:

इन पंक्तियों में गोपियाँ उद्धव से कहती हैं, हे उद्धव! जबसे श्री कृष्ण गोकुल छोड़कर मथुरा गए हैं, वह विरह हमारे मन में ही रह गई है। उस पीड़ा को न कोई सुनने वाला है और न ही किसी से कहते बनता है। इसलिए हमने इस वेदना को हृदय में ही रख लिया है क्योंकि हम कृष्ण से शिकायत कर अपने प्रेम की मर्यादा का अपमान नहीं कर सकते हैं। जब श्री कृष्ण मथुरा गए थे तो जाते समय हमें शीघ्र आने का वचन देकर गए थे परन्तु वहाँ पहुँचकर न वे वापस आए और न ही अपने आने का सन्देश ही दिया। उन्होंने अपना या हमारा कुशल-क्षेम न तो भेजा और न ही पूछा। हम उनके वियोग रूपी अग्नि में तिल-तिल करके जल रहे हैं। वह कहती हैं उद्धव तुम्हारे योग के संदेश ने हमारी वियोग रूपी आग को और अधिक बढ़ा दिया है। अर्थात्‌ तुम्हारा योग सन्देश आग में घी के समान काम कर रहा है। वह कहती हैं कि हम ऐसे व्यक्ति से गुहार लगाना चाहते हैं जो हमें श्री कृष्ण के विषय में जानकारी दे व उनका कुशल-क्षेत्र का समाचार हमें सुनाए तथा हमारा संदेश श्री कृष्ण के पास ले जाए। उनके धैर्य को धारण करने की शक्ति अब समाप्त हो चुकी है, इसका कारण है कि गोपियाँ कृष्ण के विरह में बुरी तरह जल रही हैं भाव:

Slide 18:

. उद्धव द्वारा समझाए जाने पर गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि हे उद्धव श्री कृष्ण हमारे लिए हारिल की लकड़ी के समान हैं। जिस प्रकार हारिल पक्षी लकड़ी के आश्रय को नहीं छोड़ता, उसी प्रकार हम कृष्ण का आश्रय कभी नहीं छोड़ सकते हैं। भाव यह कि हारिल पक्षी अपने पंजों पर एक लकड़ी दबाए रहता है और वह यही सोचता है कि मैं पेड़ की शाखा पर बैठा हूँ। उसी तरह गोपियाँ श्री कृष्ण के प्रेम का आश्रय लिए रहती हैं। वह कहती हैं कि हमने अपने हृदय में मन, वचन व कर्म से श्री कृष्ण को अपना मान लिया है। हमने श्री कृष्ण नामक लकड़ी को दृढ़ता से पकड़ लिया है। अब तो यह हाल है कि हम सोते-जागते, स्वप्नावस्था तथा रात-दिन श्री कृष्ण श्री कृष्ण का ही स्मरण करते रहते हैं। वह कहती हैं कि उद्धव तम्हारे द्वारा दिया गया योग का उपदेश हमें ऐसे प्रतीत होता है मानों वह कड़वी ककड़ी के सामान है जिसे निगला नहीं जा सकता। गोपियाँ कहती हैं कि तुम हमारे लिए यह कौन सी बीमारी ले आए हो जिसे हमने न कभी देखा और न कभी सुना है। गोपियाँ उद्धव को कहती हैं कि इस योग के ज्ञान की आवश्यकता तो उन्हें हैं जिनके मन चकरी के समान घूमते रहते हैं। भाव यह है कि हमने अपने हृदय से श्री कृष्ण को अपना मान लिया है। अब हमारा मन एकचित होकर कृष्ण की भक्ति करता है। जिन लोगों का मन एक स्थान पर न लगकर यहाँ वहाँ घूमता रहता है, उन लोगों को योग की आवश्यकता होती है। भाव:

Slide 20:

गोपियाँ उद्धव से कहती हैं कि कृष्ण ने द्वारिका जाकर राजनीति पढ़ ली है। तुम्हारे कहते ही हम यह समझ गईं हैं। पहले से ही कृष्ण चतुर हैं, अब तो राजनीति पढ़कर और भी चतुर हो गए हैं। उनकी बुद्धि कितनी तेज़ हो गई है, यह तो हमें पता चल गया है। उद्धव को हमें योग-संदेश पढ़ाने के लिए भेजा है। पहले समय के लोग बड़े भले लोग थे, जो परहित के लिए भागे चले जाते थे। अब हम अपने मन को वापस पा लेगीं, जिसे श्री कृष्ण ने चुरा लिया था। जिस श्रीकृष्ण ने अन्याय करने वालों से दूसरों को बचाया है, वह हमारे साथ अन्याय क्यों कर रहे हैं। गोपियाँ कहती हैं कि हे उद्धव! यह राजधर्म नहीं है। राजा का धर्म है कि वह प्रजा को सता नहीं सकता है। ढेरों शुभकामनाएँ! भाव:

Slide 21:

अन्य रचनाएँ  

Slide 24:

जी.मोती दास वी “स ” २०१३-१४

Slide 25:

धन्यवाद

authorStream Live Help