rahim ke dohe

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पाठ योजना कविता का नाम- रहीम के दोहे कवि - रहीम

प्रस्तुति :

प्रस्तुति कहि रहीम संपति सगे , बनत बहुत बहु रीती | विपति कसौटी जे कसे , तेहि  साँचे मीत || दोहा संख्या - १

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रहीम दस जी कहते हैं कि जिस तरह से सुख संपति होने से अपने सगे - संबंधी अपने हो जाते हैं | यह रीति बहुत दिनों से चली आ रही हैं परंतुजो विपति के समय खरे उतरे वह ही सच्चे  मित्र  होते हैं | भावार्थ –

शब्दार्थ - :

शब्दार्थ - (१) बहु - तरह तरह के (२ ) रीति - प्रकार के (३) कसे - खरे उतरे (४) साँचे - सच्चे (५) मीत - मित्र

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(१) संपति  होने पर क्या होता हैं ? (२) संसार कि रीति क्या हैं ? (३) सच्चे मित्र कौन हैं ? गृहकार्य –

:

जाल परे जल जात बहि , तजि मीन्न को मोह | रहिमन मछरी नीर को , तऊ न छाँडति छोड़ || दोहा संख्या - २

भावार्थ - :

भावार्थ - रहीम दस जी कहते हैं कि जिस प्रकार मछुआरे नदी के जल में जाल डालने पर मछली को पकड़ने का मोह नहीं छोड़ते उसी प्रकार मछली भी जल के मोह को नहीं छोड़ सकती हैं अर्थात मछली जल के बिना नहीं रह सकती हैं |

शब्दार्थ -  :

शब्दार्थ - (१) जल - पानी (२ ) तजि – छोड़कर (३) मीन – मछली (४) छोह - मोह (५) तऊ - तब भी

गृहकार्य -:

गृहकार्य - (१) मछलियाँ क्या होती हैं ? (२) जल में पानी क्यों नहीं रुकता हैं ? (३) जल तथा नीर किसके पर्यावाची हैं ? (४) मछली पानी के बिना क्यों नहीं रह सकती हैं ?

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प्रस्तुत द्वारा भानुप्रीत सिंह

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