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संत कबीर ईशान मित्तल कक्षा :10- डी रोल नंबर : 17

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संत कबीर संत कबीर कबीर सन्त कवि और समाज सुधारक थे। ये सिकन्दर लोदी के समकालीन थे। कबीर का अर्थ अरबी भाषा में महान होता है। कबीरदास भारत के भक्ति काव्य परंपरा के महानतम कवियों में से एक थे।भारत में धर्म , भाषा या संस्कृति किसी की भी चर्चा बिना कबीर की चर्चा के अधूरी ही रहेगी। कबीरपंथी , एक धार्मिक समुदाय जो कबीर के सिद्धांतों और शिक्षाओं को अपने जीवन शैली का आधार मानते हैं।

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जीवन काशी के इस अक्खड़ , निडर एवं संत कवि का जन्म लहरतारा के पास सन् १३९८ में ज्येष्ठ पूर्णिमा को हुआ। जुलाहा परिवार में पालन पोषण हुआ , संत रामानंद के शिष्य बने और अलख जगाने लगे। कबीर सधुक्कड़ी भाषा में किसी भी सम्प्रदाय और रूढ़ियों की परवाह किये बिना खरी बात कहते थे। कबीर ने हिंदू - मुसलमान सभी समाज में व्याप्त रूढ़िवाद तथा कट्टरपंथ का खुलकर विरोध किया। कबीर की वाणी उनके मुखर उपदेश उनकी साखी , रमैनी , बीजक , बावन - अक्षरी , उलटबासी में देखें जा सकते हैं। गुरु ग्रंथ साहब में उनके २०० पद और २५० साखियां हैं। काशी में प्रचलित मान्यता है कि जो यहॉ मरता है उसे मोक्ष प्राप्त होता है। रूढ़ि के विरोधी कबीर को यह कैसे मान्य होता। काशी छोड़ मगहर चले गये और सन् १५१८ के आस पास वहीं देह त्याग किया। मगहर में कबीर की समाधि है जिसे हिन्दू मुसलमान दोनों पूजते हैं।

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मतभेद भरा जीवन हिंदी साहित्य में कबीर का व्यक्तित्व अनुपम है। गोस्वामी तुलसीदास को छोड़ कर इतना महिमामण्डित व्यक्तित्व कबीर के सिवा अन्य किसी का नहीं है। कबीर की उत्पत्ति के संबंध में अनेक किंवदन्तियाँ हैं। कुछ लोगों के अनुसार वे जगद्गुरु रामानन्द स्वामी के आशीर्वाद से काशी की एक विधवा ब्राह्मणी के गर्भ से उत्पन्न हुए थे। ब्राह्मणी उस नवजात शिशु को लहरतारा ताल के पास फेंक आयी। उसे नीरु नाम का जुलाहा अपने घर ले आया। उसी ने उसका पालन - पोषण किया। बाद में यही बालक कबीर कहलाया। कतिपय कबीर पन्थियों की मान्यता है कि कबीर की उत्पत्ति काशी में लहरतारा तालाब में उत्पन्न कमल के मनोहर पुष्प के ऊपर बालक के रूप में हुई। एक प्राचीन ग्रंथ के अनुसार किसी योगी के औरस तथा प्रतीति नामक देवाङ्गना के गर्भ से भक्तराज प्रहलाद ही संवत् १४५५ ज्येष्ठ शुक्ल १५ को कबीर के रूप में प्रकट हुए थे।

काव्यरुप एवं संक्षिप्त परिचय :

काव्यरुप एवं संक्षिप्त परिचय कबीर की रचनाओं के बारें में कहा जाता है कि संसार के वृक्षों में जितने पत्ते हैं तथा गंगा में जितने बालू - कण हैं , उतनी ही संख्या उनकी रचनाओं की है :- जेते पत्र वनस्पति औ गंगा की रेन । पंडित विचारा का कहै , कबीर कही मुख वैन।। विभिन्न समीक्षकों तथा विचारकों ने कबीर के विभिन्न संग्रहों का अध्ययन करके निम्नलिखित काव्यरुप पाये हैं :- साखी पद रमेनी

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चौंतीसा वावनी विप्रमतीसी वार थिंती चाँवर बसंत हिंडोला बेलि कहरा विरहुली उलटवाँ

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" जाति जुलाहा नाम कबीरा बनि बनि फिरो उदासी। ' "" सकल जनम शिवपुरी गंवाया। मरती बार मगहर उठि आया।। '‘ "" अबकहु राम कवन गति मोरी। तजीले बनारस मति भई मोरी।। '' चाह मिटी, चिंता मिटी मनवा बेपरवाह ।  जिसको कुछ नहीं चाहिए वह शहनशाह॥

जन्म स्थान :

जन्म स्थान कबीर ने अपने को काशी का जुलाहा कहा है। कबीर पंथी के अनुसार उनका निवास स्थान काशी था। बाद में , कबीर एक समय काशी छोड़कर मगहर चले गए थे। ऐसा वह स्वयं कहते हैं :- "" सकल जनम शिवपुरी गंवाया। मरती बार मगहर उठि आया।। '‘ कहा जाता है कि कबीर का पूरा जीवन काशी में ही गुजरा , लेकिन वह मरने के समय मगहर चले गए थे। कबीर वहाँ जाकर दु : खी थे। वह न चाहकर भी , मगहर गए थे। "" अबकहु राम कवन गति मोरी। तजीले बनारस मति भई मोरी।। ''

कबीर के माता- पिता  :

कबीर के माता - पिता   कबीर के माता - पिता के विषय में भी एक राय निश्चित नहीं है। " नीमा ' और " नीरु ' की कोख से यह अनुपम ज्योति पैदा हुई थी , या लहर तालाब के समीप विधवा ब्राह्मणी की पाप - संतान के रुप में आकर यह पतितपावन हुए थे , ठीक तरह से कहा नहीं जा सकता है। कई मत यह है कि नीमा और नीरु ने केवल इनका पालन - पोषण ही किया था। एक किवदंती के अनुसार कबीर को एक विधवा ब्राह्मणी का पुत्र बताया जाता है , जिसको भूल से रामानंद जी ने पुत्रवती होने का आशीर्वाद दे दिया था।

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धर्म के प्रति साधु संतों का तो घर में जमावड़ा रहता ही था। कबीर पढ़े - लिखे नहीं थे - ' मसि कागद छूवो नहीं , कलम गही नहिं हाथ। ' उन्होंने स्वयं ग्रंथ नहीं लिखे , मुँह से भाखे और उनके शिष्यों ने उसे लिख लिया। आप के समस्त विचारों में रामनाम की महिमा प्रतिध्वनित होती है। वे एक ही ईश्वर को मानते थे और कर्मकाण्ड के घोर विरोधी थे। अवतार , मूर्त्ति , रोज़ा , ईद , मसजिद , मंदिर आदि को वे नहीं मानते थे।

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धन्यवाद

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