विनयअऔर भक्ति,सच्ची मित्रता-सूरदास,तुलसीदास

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भक्तिकाल [1375 – 1700] भक्तिकाल के दौरान जन-कवियों ने राजतंत्र का विरोध किया और आम जनता के हितों के लिए अपनी वाणी द्वारा संघर्ष किया। भक्तिकाल के कवियों ने भक्ति-परक और नीति-परक रचनाओं के द्वारा आम लोगों में संघर्ष करने की शक्ति का संचार किया।

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भक्तिकाल के कुछ प्रमुख जनकवि तुलसीदास कबीरदास सूरदास मीराबाई चैतन्य महाप्रभु रहीम गुरुनानक रसखान

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विनय और भक्ति सूरदास कृष्ण-भक्त कवि – सगुण भक्ति वल्लभाचार्य के शिष्य जन्म से ही दृष्टिहीन कृष्ण की विविध लीलाओं का वर्णन रचनाओं में भक्ति, वात्सल्य और श्रृंगार का वर्णन ब्रजभाषा का साहित्यिक प्रयोग प्रमुख रचनाएँ – सूरसागर, सूरसारावली और साहित्य लहरी कवि-परिचय

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चरण कमल बंदौं हरिराई। जाकी कृपा पंगु गिरि लंघै, अंधे कूँ सब कछु दरसाई। बहिरो सुनै मूक पुनि बोले, रंक चले सिर छ्त्र धराई। सूरदास स्वामी करुणामय, बार-बार बंदौं तेहि पाई॥ कठिन शब्दार्थ बंदौं – वंदना, पूजा-पाठ हरिराई - प्रभु मूक – गूंगा छ्त्र – छाता धराई - रखकर

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अविगत-गति कछु कहत न आवै। ज्यौं गूँगे मीठे फल को रस अंतरगत ही भावै। परम स्वाद सब ही सु निरंतर, अमित तोष उपजावै। मन बानी को अगम अगोचर, सो जाने जो पावै। रूप-रेख-गुन-जाति-जुगति-बिनु, निरालंब कित धावै। सब विधि अगम विचारहि तातें, सूर सगुन-पद गावै॥ कठिन शब्दार्थ अविगत – जिसको जाना न जा सके अमित – असीमित तोष – संतोष अगोचर – इन्द्रियों की पहुँच से परे तातें – उसी के कारण

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मेरो मन अनत कहाँ सुख पावै। जैसे उड़ि जहाज़ को पंछी, फिरि जहाज़ पै आवै। कमल-नैन को छाँडि महातम, और देव को ध्यावै। परम-गंगा को छाँडि पियासौ, दुरमति कूप खनावै। जिहि मधुकर अंबुज रस-चाख्यौ, क्यों करील फल खावै। सूरदास प्रभु कामधेनु तजि, छेरी कौन दुहावै॥ कठिन शब्दार्थ अनत – और जगह दुरमति – बेवकूफ़ कूप – कुआँ मधुकर – भँवरा अंबुज – कमल छेरी - बकरी

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सच्ची मित्रता तुलसीदास कवि-परिचय राम-भक्त कवि – सगुण भक्ति नरहरिदास के शिष्य श्री राम के मर्यादा पुरुषोत्तम रूप का चित्रण रचनाओं में भारतीय संस्कृति, धर्म, दर्शन तथा भक्ति का वर्णन ब्रज और अवधी भाषा का साहित्यिक प्रयोग प्रमुख रचनाएँ – रामचरितमानस, दोहावली, गीतावली, कवितावली, विनयपत्रिका, पार्वती मंगल आदि

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जे न मित्र दुख होहिं दुखारी। तिन्हहि बिलोकत पातक भारी॥ निज दुख गिरि सम रज करि जाना। मित्रक दुख मेरु समाना॥ जिन्ह के असि मति सहज न आई। ते सठ कत हठि करत मिताई॥ कुपथ निवारि सुपंथ चलावा। गुन प्रकटै अवगुनहि दुरावा॥ कठिन शब्दार्थ दुखारी – दुखी बिलोकत – देखने से पातक – पाप गिरि – पर्वत मेरु – सुमेरु (एक बड़ा पर्वत)

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देत-लेत मन संक न धरई। बल अनुमान सदा हित करई॥ आगे कह मृदु बचन बनाई। पाछे अनहित मन कुटिलाई॥ जाकर चित अहि गति सम भाई। अस कुमित्र परेहरेहिं भलाई॥ सेवक सठ नृप कृपन कुनारी। कपटी मित्र सूल सम चारी॥ कठिन शब्दार्थ संक – शंका धरई – रखना चित – मन अस – ऐसा परेह्ररेहिं – छोड़ना कृपन - कंजूस कुनारी – बुरी स्त्री कपटी – धोखेबाज सूल – काँटा अहि – साँप सठ – मूर्ख नृप - राजा

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