History of Sagarvanshi Samaj

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सगरवंशी समाज का इतिहास

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Bhagiratheshwar Mahadev Namah : Near Sarjawas Gate, Kumharwara , Sirohi (Rajasthan) 307001

HISTORY OF SAGAR SAMAJ:

HISTORY OF SAGAR SAMAJ The Ganga has an exalted position in the Hindu ethos. It is repeatedly invoked in the Vedas, the Puranas, and the two Indian epics, the Ramayana and the Mahabharata. Ganga is a goddess, Ganga devi, one of two daughters of Meru (the Himalayas), the other being Uma, consort of Shiva. In her youth, Indra had asked for Ganga to be given to heaven to soothe the Gods with its cool waters. The story of its descent to earth appears in slightly different forms in Ramayana (Bala Kanda: Vishwamitra narrates it to the child Rama), Mahabharata (Aranya Parba: Agastya narrates it to Rama), and in the Puranas. These myths are variously dated between 2000 to 400 BC (you may be interested in this over-detailed dateline for Rama's life). The general outline of the story is:

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The king Sagara had two wifes. By a favour of the lord Shiva, one wife bore him sixty thousand sons, all of whom were to die simultaneously, and the other bore him one son, Asamanjas, who would continue the dynasty. The sixty thousand sons grew to be great warriors, while the mighty Asamanjas caused so much misery to the populace that his father the king had to expel his own son, though a grandson, Ansuman, was left behind. King Sagara once performed the horse ceremony, in which a horse is allowed to roam at will, and is followed by warriors. Stopping the horse is a challenge to war; not stopping it is a compact of obeisance. In this instance, the sixty thousand sons were following the horse, but surprisingly, the horse was lost. After much recrimination, they dug up the entire earth and the underworld, the oceans, searching for the horse. Eventually it was found in a deep cavern, loitering close to where the sage Kapila sat in radiant meditation. The sons gathered the horse but they disturbed the great Kapila (Vasudeva), who was very annoyed, and instantly burnt them to ash with his fiery gaze .

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Sagara heard of this fate through Narada, the heavenly wanderer, and sent the grandson Ansuman to undo the harm. Ansuman descended to the underworld and met Kapila, who was much pleased with the youth's bearing and conversation. He granted that the soulse of the sons of Sagara may be released by the waters of Ganga, then resident in heaven. Despite much austerity and prayer, neither Sagara, nor Ansuman after him, nor his son Dilipa, could get Ganga to appear on earth. Finally it was Dilipa's son Bhagiratha, who after severe austerities, propitiated the Goddess, and she agreed to come down to earth. However, the impact of her fall would be so severe, that it could be borne by none less than Shiva himself. Therefore Bhagiratha went into meditation again and obtained Shiva's consent after many more austerities. Finally, the river came down and fell into Shiva's matted hair, and thence to earth. This is the presumed site of the present-day temple at Gangotri. Bhagiratha led the way on horse back and the river followed. In this manner they reached the spot where lay the ashes of the six thousand sons. They were thus liberated, and an ocean formed from the waters there. This is the Sagar Island of today, where the Ganges flows into the Bay of Bengal ("Sagara' is also Sanskrit for ocean).

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Temple of Sagarvanshi Samaj at Sirohi

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कई वर्षों बाद , सगर नामक एक राजा को जादुई रूप से साठ हज़ार पुत्रों की प्राप्ति हो गयी. एक दिन राजा सगर ने अपने साम्राज्य की समृद्धि के लिए एक अनुष्ठान करवाया। एक अश्व उस अनुष्ठान का एक अभिन्न हिस्सा था जिसे   इंद्र   ने ईर्ष्यावश चुरा लिया। सगर ने उस अश्व की खोज के लिए अपने सभी पुत्रों को पृथ्वी के चारों तरफ भेज दिया। उन्हें वह पाताललोक में ध्यानमग्न कपिल ऋषि के निकट मिला। यह मानते हुए कि उस अश्व को कपिल ऋषि द्वारा ही चुराया गया है , वे उनका अपमान करने लगे और उनकी तपस्या को भंग कर दिया. ऋषि ने कई वर्षों में पहली बार अपने नेत्रों को खोला और सगर के बेटों को देखा। इस दृष्टिपात से वे सभी के सभी साठ हजार जलकर भस्म हो गए। अंतिम संस्कार न किये जाने के कारण सगर के पुत्रों की आत्माएं प्रेत बनकर विचरने लगीं। जब दिलीप के पुत्र और सगर के एक वंशज भगीरथ ने इस दुर्भाग्य के बारे में सुना तो उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे गंगा को पृथ्वी पर लायेंगे ताकि उसके जल से सगर के पुत्रों के पाप धुल सकें और उन्हें मोक्ष प्राप्त हो सके। भगीरथ ने गंगा को पृथ्वी पर लाने के लिए ब्रह्मा जी की तपस्या की. ब्रह्मा जी मान गए और गंगा को आदेश दिया कि वह पृथ्वी पर जाये , और वहां से पाताललोक जाये ताकि भगीरथ के वंशजों को मोक्ष प्राप्त हो सके। गंगा को यह काफी अपमानजनक लगा और उसने तय किया कि वह पूरे वेग के साथ स्वर्ग से पृथ्वी पर गिरेगी और उसे बहा ले जायेगी। तब भगीरथ ने घबराकर   शिवजी   से प्रार्थना की कि वे गंगा के वेग को कम कर दें। गंगा पूरे अहंकार के साथ शिव के सिर पर गिरने लगी। लेकिन शिव जी ने शांति पूर्वक उसे अपनी जटाओं में बांध लिया और केवल उसकी छोटी-छोटी धाराओं को ही बाहर निकलने दिया। शिव जी का स्पर्श प्राप्त करने से गंगा और अधिक पवित्र हो गयी. पाताललोक की तरफ़ जाती हुई गंगा ने पृथ्वी पर बहने के लिए एक अन्य धारा का निर्माण किया ताकि अभागे लोगों का उद्धार किया जा सके। गंगा एकमात्र ऐसी नदी है जो तीनों लोकों में बहती है-स्वर्ग , पृथ्वी , तथा पाताल। इसलिए   संस्कृत   भाषा में उसे "त्रिपथगा" (तीनों लोकों में बहने वाली) कहा जाता है। भगीरथ के प्रयासों से गंगा के पृथ्वी पर आने के कारण उसे भगीरथी भी कहा जाता है ; और दुस्साहसी प्रयासों तथा दुष्कर उपलब्धियों का वर्णन करने के लिए "भगीरथी प्रयत्न" शब्द का प्रयोग किया जाता है। गंगा को जाह्नवी नाम से भी जाना जाता है। ऐसा कहा जाता है कि पृथ्वी पर आने के बाद गंगा जब भगीरथ की तरफ बढ़ रही थी , उसके पानी के वेग ने काफी हलचल पैदा की और जाह्नू नामक ऋषि की साधना तथा उनके खेतों को नष्ट कर दिया। इससे क्रोधित होकर उन्होंने गंगा के समस्त जल को पी लिया। तब देवताओं ने जाह्नू से प्रार्थना की कि वे गंगा को छोड़ दें ताकि वह अपने कार्य हेतु आगे बढ़ सके। उनकी प्रार्थना से प्रसन्न होकर जाह्नू ने गंगा के जल को अपने कान के रास्ते से बह जाने दिया। इस प्रकार गंगा का जाह्नवी" नाम (जाह्नू की पुत्री) पड़ा। ऐसी मान्यता है कि सरस्वती नदी के समान ही ,  कलयुग  ( वर्तमान का अंधकारमय काल) के अंत तक गंगा पूरी तरह से सूख जायेगी और उसके साथ ही यह युग भी समाप्त हो जायेगा। उसके बाद   सतयुग ( अर्थात सत्य का काल) का उदय होगा। HkkxhjFk dh dBksj riL;k } kjk xaxk dk / kjrh ij vorj.k vkSj lxj ds iq = ksa jktk lxj ds oa’ktksa vFkkZr ~ ¼lxjoa’kh lekt ½ ds m) kj dh dFkk

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सगर का यज्ञ भगवान   श्रीराम   से बहुत पहले   इक्ष्वाकु वंश   में सगर राजा हुए थे। वह बहुत वीर और साहसी थे। उनका राज्य जब बहुत दूर-दूर तक फैल गया तो उन्होंने एक बड़ा   यज्ञ   किया। पुराने समय में   अश्वमेध यज्ञ होता था। इस यज्ञ में एक घोड़ा   पूजा   करके छोड़ दिया जाता था और घोड़े के पीछे राजा की सेना रहती थी। अगर किसी ने उस घोड़े को पकड लिया तो सेना युद्ध करके उसे छुड़ाती थी। जब घोड़ा चारों ओर घूमकर वापस आ जाता तो यज्ञ किया जाता था। यज्ञ के सम्पन्न होते ही वह राजा ' चक्रवर्ती ' माना जाता था। यज्ञ का घोड़ा राजा   सगर   इसी प्रकार का यज्ञ कर रहे थे। भारतवर्ष के सारे राजा सगर को चक्रवर्ती मानते थे , पर राजा   इन्द्र   को सगर की प्रसिद्धि देखकर जलन होती थी। जब उसे मालूम हुआ कि सगर अश्वमेध यज्ञ कर रहे हैं तो वह चुपके से सगर द्वारा पूजा करके छोड़े हुए घोड़े को चुरा ले गया और बहुत दूर   कपिल मुनि की गुफ़ा में जाकर बांध दिया। दूसरे दिन जब घोड़े को छोड़ने का समय पास आया तो पता चला कि अश्वशाला में घोड़ा नहीं ह। यज्ञ-भूमि में शोक छा गया। सेना ने खोजा पर घोड़ा न मिला तो महाराज के पास समाचार पहुंचा। महाराज ने सुना और सोच में पड़ गये। राजा सगर की बड़ी रानी का एक बेटा था , उनका नाम   असमंजस   था। असमंजस बालकों को परेशान करता था। सगर ने लोगों की पुकार सुनी और अपने बेटे असमंजस को देश से निकाल दिया। असमंजस का पुत्र था   अंशुमान । राजा सगर की छोटी रानियों के बहुत से बेटे थे। कहा जाता है कि ये साठ हज़ार थे। सगर के ये पुत्र बहुत बलवान और चतुर थे और तरह-तरह की विद्याओं को जानते थे। जब सेना घोड़े का पता लगाकर हार गये तो महाराज ने अपने साठ हज़ार पुत्रों को बुलाया और कहा , ‘‘ पुत्रो , चोर ने   सूर्यवंश   का अपमान किया है। तुम सब जाओ और घोड़े का पता लगाओ। ’’ राजकुमारों ने घोड़े को खोजना शुरू किया। गांवों और कस्बों में खोजा , साधुओं के आश्रमों में गये , तपोवनों में गये और योगियों की गुफ़ाओं में पहुंचे। पर्वतों के बर्फीले सफ़ेद शिखरों पर पहुंचे , वन-वन घूमे , पर यज्ञ का घोड़ा उनको कहीं नहीं दिखाई दिया।

साठ हज़ार राजकुमार खोजते-खोजते वे धरती के छोर के आगे समुद्र था। चूंकि सगर के पुत्रों ने समुद्र की इतनी खोज-बीन की, इसलिए समुद्र ‘सागर’ भी कहलाने लगा। घोड़ा नहीं मिला, फिर भी राजकुमार हारे नहीं। वे आगे बढ़ रहे थे कि हवा चल पड़ी। एक लता हिली और एक शिला दिखाई पड़ी। शिला हटाई जाने लगी। शिला के पीछे एक गुफ़ा का मुंह निकल आया। राजकुमार गुफ़ा में गये। वहाँ उन्होंने देखा कि एक बहुत पुराना पेड़ है। उसके नीचे एक ऋषि बैठे है। वह अपनी समाधि में लीन थे। ऋषि के पीछे कुछ दूर पर एक पेड़ था। उसके तने से घोड़ा बंधा था। राजकुमार दौड़कर घोड़े के पास गये और घोड़े को पहचान लिया। ऋषि को देखा, तो उनका क्रोध बढ़ गया। राजकुमारों ने बहुत शोर मचाया। उनमें से एक का हाथ ऋषि के शरीर पर पड़ा तो ऋषि की देह कांपी और वह समाधि से जागे। :

साठ हज़ार राजकुमार खोजते-खोजते वे धरती के छोर के आगे समुद्र था। चूंकि सगर के पुत्रों ने समुद्र की इतनी खोज-बीन की , इसलिए समुद्र ‘ सागर ’ भी कहलाने लगा। घोड़ा नहीं मिला , फिर भी राजकुमार हारे नहीं। वे आगे बढ़ रहे थे कि हवा चल पड़ी। एक लता हिली और एक शिला दिखाई पड़ी। शिला हटाई जाने लगी। शिला के पीछे एक गुफ़ा का मुंह निकल आया। राजकुमार गुफ़ा में गये। वहाँ उन्होंने देखा कि एक बहुत पुराना पेड़ है। उसके नीचे एक ऋषि बैठे है। वह अपनी समाधि में लीन थे। ऋषि के पीछे कुछ दूर पर एक पेड़ था। उसके तने से घोड़ा बंधा था। राजकुमार दौड़कर घोड़े के पास गये और घोड़े को पहचान लिया। ऋषि को देखा , तो उनका क्रोध बढ़ गया। राजकुमारों ने बहुत शोर मचाया। उनमें से एक का हाथ ऋषि के शरीर पर पड़ा तो ऋषि की देह कांपी और वह समाधि से जागे।

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मुनि का श्राप उनकी आंखें खुलीं। उनकी आंखों में तेज़ भरा था। वह तेज़ राजकुमारों के ऊपर पड़ा तो राजकुमार जल उठे। जब ऋषि की आंखें पूरी तरह से खुलीं तो उन्होंने अपने सामने बहुत-सी राख की ढेरियां पड़ी पाई। ये राख की ढेरियां साठ हज़ार थी। साठ हज़ार राजकुमारों को गये बहुत दिन हो गये। उनकी कोई ख़बर न आयी। राजा सगर की चिंतित हो गये। तभी एक दूत ने बताया कि बंगाल से कुछ मछुवारे आये हैं , उन्होंने बताया कि उन्होंने राजकुमारों को एक गुफ़ा में घुसते देखा और वे अभी तक उस गुफ़ा से निकलकर नहीं आये। सगर सोच में पड़ गये। राजकुमार किसी बड़ी मुसीबत में फंस गये हैं। राजा ने ऊंच-नीच सोची और अपने पोते अंशुमान को बुलाया। अंशुमान के आने पर सगर ने कहा , ‘‘ बेटा , तुम्हारे साठ हज़ार चाचा बंगाल में सागर के किनारे एक गुफ़ा में घुसते हुए देखे गये हैं , पर उसमें से निकलते हुए उनको अभी तक किसी ने नहीं देखा है। ’’ सगर ने कहा , ‘‘ बेटा , तुम्हारे साठ हज़ार.... ’’ अंशुमान का चेहरा खिल उठा। वह बोला , ‘‘ बस! यही समाचार है। यदि आप आज्ञा दें तो मैं जाऊं और पता लगाऊं। ” सगर बोले , ‘‘ जा , अपने चाचाओं का पता लगा। ” जब अंशुमान जाने लगा तो बूढ़े राजा सगर ने उसे फिर छाती से लगाया और आशीष देकर उसे विदा किया। अंशुमान इधर-उधर नहीं घूमा। वह सीधा उसी गुफ़ा के दरवाज़े पर पहुंचा। गुफ़ा के दरवाज़े पर वह ठिठक गया। उसने कुल के   देवता   सूर्य   को प्रणाम किया और गुफ़ा के भीतर पैर रखा। अंधेरे से उजाले में पहुंचा तो अचानक रुककर खड़ा हो गया। उसने देखा दूर-दूर तक राख की ढेरियां फैली हुई थीं। वह थोड़ा ही आगे गया कि एक गम्भीर आवाज़ सुनाई दी , ‘‘ आओ , बेटा अंशुमान , यह घोड़ा बहुत दिनों से तुम्हारी राह देख रहा है। ” अंशुमान चौंका। उसने देखा एक दुबले-पतले ऋषि हैं , जो घोड़े के निकट खड़े है। अंशुमान रुका। उसने धरती पर सिर टेककर ऋषि को नमस्कार किया। “ आओ बेटा , अंशमान , यह घोड़ा तुम्हारी राह देख रहा है। ” ऋषि बोले , ‘‘ बेटा अंशुमान , तुम भले कामों में लगो। मैं कपिल मुनि तुमको आशीष देता हूं। ” अंशुमान ने उन महान कपिल को प्रणाम किया। कपिल बोले , “ जो होना था , वह हो गया। ” अंशुमान ने हाथ जोड़कर पूछा , “ क्या हो गया , ऋषिवर ?” ऋषि ने राख की ढेरियों की ओर इशारा करके कहा , “ ये साठ हज़ार ढेरियां तुम्हारे चाचाओं की हैं , अंशुमान! ”

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अंशुमान के मुंह से चीख निकल गई। उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह चली ऋषि ने समझाया , “ धीरज धरो बेटा , मैंने जब आंखें खोलीं तो तुम्हारी चाचाओं को जलते पाया। उनका अहंकार उभर आया था। वे समझदारी से दूर हट गये थे। उनका अधर्म भड़का और वे जल गये। मैं देखता रह गया। कुछ न कर सका। ” अंशुमान ने कहा , “ ऋषिवर! ” कपिल बोले , “ बेटा , दुखी मत होओ। घोड़े को ले जाओ और अपने बाबा को धीरज बंधाओ। महाप्रतापी राजा सगर से कहना कि आत्मा अमर है। देह के जल जाने से उसका कुछ नहीं बिगड़ता। ” अंशुमान ने कपिल के सामने सिर झुकाया और कहा , “ ऋषिवर! मैं आपकी आज्ञा का पालन करुंगा। पर मेरे चाचाओं की अकाल मौत हुई है। उनको शांति कैसे मिलेगी ?” कपिल ने कुछ देर सोचा और बोले , “ बेटा , शांति का उपाय तो है , पर काम बहुत कठिन है। ” अंशुमान ने सिर झुकाकर कहा , “ ऋषिवर! सूर्यवंशी कामों की कठिनता से नहीं डरते। ” कपिल बोले , “ गंगा जी धरती पर आयें और उनका जल इन राख की ढेरियों को छुए तो तुम्हारे चाचा तर जायंगे। ” अंशुमान ने पूछा , “ गंगाजी कौन हैं और कहां रहती है ?” कपिल ने बताया , “ गंगाजी   विष्णु   के पैरों के नखों से निकली हैं और   ब्रह्मा   के कमण्डल में रहती हैं। ” अंशुमान ने पूछा , “ गंगाजी को धरती पर लाने के लिए मुझे क्या करना होगा ?” ऋषि ने कहा , “ तुमको ब्रह्मा की विनती करनी होगी। जब ब्रह्मा तप पर रीझ जायंगे तो प्रसन्न होकर गंगाजी को धरती पर भेज देंगे। उससे तुम्हारे चाचाओं का ही भला नहीं होगा और भी करोंड़ों आदमी लाभ उठा सकेंगे। ” अंशुमान ने हाथ उठाकर वचन दिया कि जब तक गंगाजी को धरती पर नहीं उतार लेंगे , तब तक मेरे वंश के लोग चैन नहीं लेंगे। कपिल मुनि ने अपना आशीष दिया। अंशुमान सूर्य वंश के थे। इसी कुल के   सत्यवादी राजा हरिश्चन्द्र   को सब जानते हैं। अंशुमान ने ब्रह्माजी की विनती की। बहुत कड़ा तप किया , अपनी जान दे दी , पर ब्रहाजी प्रसन्न नहीं हुए। अंशुमान के बेटे राजा   दिलीप   ने पिता के वचन को अपना वचन समझा और बड़ा भारी तप किया। ऐसा तप किया कि ऋषि और मुनि चकित हो गये। उनके सामने सिर झुका दिया। पर ब्रह्मा उनके तप पर भी नहीं रीझे।

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HkkxhjFk दिलीप के बेटे थे भगीरथ। भगीरथ के सामने बाबा का वचन और पिता का तप था। उन्होंने तप में मन लगा दिया। सभी देवताओं को ख़बर लगी। देवों ने सोचा , “ गंगा   जी हमारी हैं। जब वह उतरकर धरती पर चली जायेगीं तो हमें कौन पूछेगा ?” देवताओं ने सलाह की और   उर्वशी   और   अलका   को बुलाया। उनसे कहा राजा भगीरथ के पास जाओ और कोशिश करो कि वह अपने तप से डगमगा जायें। अलका और उर्वशी ने भगीरथ को देखा। एक सादा-सा आदमी अपनी धुन में था। उन दोनों ने भगीरथ के चारों ओर बसंत बनाया। चिड़ियां चहकने लगीं। कलियां चटकने लगी। मंद पवन बहने लगा। लताएं झूमने लगीं। कुंज मुस्कराने लगे। दोनों अप्सराएं नाचीं। मोहिनी फैलाई और चाहा कि भगीरथ तप को छोड़ दें। पर भगीरथ पर असर नहीं हुआ। जब उर्वशी का लुभाव बढ़ा तो भगीरथ के तप का तेज़ बढ़ा। दोनों हारीं और लौट गई। उनके लौटते ही ब्रह्मा पसीज गये। वह सामने आये और बोले , “ बेटा , वर मांग! ” भगीरथ ने कहा "गंगा को धरती पर भेजिए" भगीरथ की बात सुनकर ब्रह्मा जी ने क्षण भर सोचा , फिर बोले , “ ऐसा ही होगा , भगीरथ। ” ब्रह्मा जी के मुंह से यह वचन निकले और उनके हाथ का कमण्डल बड़े ज़ोर से कांपने लगा। ऐसा लगता था जैसे कि वह टुकड़े-टुकड़े हो जायगा। थोड़ी देर बाद उसमें से एक स्वर सुनाई दिया , “ ब्रह्मा , ये तुमने क्या किया ? तुमने भगीरथ को क्या वर दे डाला ?” ब्रह्मा बोले , “ मैंने ठीक ही किया है , गंगा! ” गंगा चौंकीं और बोलीं , “ तुम मुझे धरती पर भेजना चाहते हो और कहते हो कि तुमने ठीक ही किया है! ” “ हां , देवी! ” ब्रह्मा ने कहा। “ कैसे ?” गंगा ने पूछा। ब्रह्मा ने बताया , “ देवी , आप संसार का दु:ख दूर करने के लिए पैदा हुई हैं। आप अभी मेरे कमण्डल में बैठी हैं। अपना काम नहीं कर रही हैं। ” गंगा ने कहा , “ ब्रह्मा , धरती पर पापी , पाखंडी , पतित रहते हैं। तुम मुझे उन सबके बीच भेजना चाहते हो ?” ब्रह्मा बोले , “ देवी , आप बुरे को भला बनाने के लिए , पापी को उबारने के लिए , पाखंड मिटाने के लिए , पतित को तारने के लिए , कमज़ोरों को सहारा देने के लिए और नीचों को उठाने के लिए ही बनी हैं। ” गंगा ने कहा , “ ब्रह्मा! ” ब्रह्मा बोले , “ देवी , बुरों की भलाई करने के लिए तुमको बुरों के बीच रहना होगा। पापियों को उबारने के लिए पापियों के बीच रहना होगा। पाखंड को मिटाने के लिए पाखंड के बीच रहना होगा। पतितों को तारने के लिए पतितों के बीच रहना होगा। कमज़ोरों को सहारा देने के लिए कमज़ोरों के बीच रहना होगा और नीचों को उठाने के लिए नीचों के बीच निवास करना होगा। तुम अपने धर्म को पहचानों , अपने करम को जानों। ” गंगा थोड़ी देर चुप रहीं। फिर बोलीं , “ ब्रह्मा , तुमने मेरी आंखें खोल दी हैं। मैं धरती पर जाने को तैयार हूं। पर धरती पर मुझे संभालेगा कौन ?” ब्रह्मा ने भगीरथ की ओर देखा। भगीरथ ने उनसे पूछा , “ आप ही बताइये। ”

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शिव ब्रह्मा   बोले , “ तुम भगवान   शिव   को प्रसन्न करो। यदि वह तैयार हो गये तो गंगा को संभाल लेंगे और गंगा धरती पर उतर आयंगी। ” ब्रह्मा उपाय बताकर चले गये। भगीरथ अब शिव को रिझाने के लिए तप करने लगे। भगवान शिव शंकर हैं।   महादेव   हैं। वह दानी है , सदा देते रहते है और सोचते रहते हैं कि लोग और मांगें तो और दें। भगीरथ ने बड़े भक्ति भाव से विनती की।   हिमालय   के कैलाश पर निवास करने वाले शंकर रीझ गये। भगीरथ के सामने आये और अपना   डमरु   खड़-खड़ाकर बोले , “ मांग बेटा , क्या मांगता है ?” भगीरथ बोले , “ भगवान , शंकर की जय हो! गंगा मैया धरती पर उतरना चाहती हैं , भगवन! कहती हैं..... ” शिव ने भगीरथ को आगे नहीं बोलने दिया। वह बोले , “ भगीरथ , तुमने बहुत बड़ा काम किया है। मैं सब बातें जानता हूं। तुम गंगा से विनती करो कि वह धरती पर उतरें। मैं उनको अपने मस्तक पर धारण करुंगा। ” भगीरथ ने आंखें ऊपर उठाई , हाथ जोड़े और गंगाजी से कहने लगे , “ मां , धरती पर आइये। मां , धरती पर आइये। भगवान शिव आपको संभाल लेंगे। ” भगीरथ गंगाजी की विनती में लगे और उधर भगवान शिव गंगा को संभालने की तैयार करने लगे। गंगा ने ऊपर से देखा कि धरती पर शिव खड़े हैं। देखने में वह छोटे से लगते हैं। वह मुस्कराई। यह शिव मुझे संभालेंगे ? मेरे वेग को संभालेंगे ? मेरे तेज़ को संभालेंगे ? इनका इतना साहस ? मैं इनको बता दूंगी कि गंगा को संभालना सरल काम नहीं है।

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THE END Vinod Kumar Sagarvanshi

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