हिन्दी दोहें Presentation

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An excellent presentation on Hindi Dohas of four famous ancient poets Please subscribe:- "http://www.authorstream.com/Abhishek.mallick28/THE-VIBRANT"

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दोहें अभिषेक मल्लिक द्वारा प्रस्तुत

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तुलसीदास

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तुलसी मीठे बचन ते सुख उपजत चहुँ ओर । बसीकरन एक मंत्र है परिहरू बचन कठोर ।। बिना तेज के पुरुष की अवशि अवज्ञा होय । आगि बुझे ज्यों राख की आप छुवै सब कोय ।। तुलसी साथी विपत्ति के विद्या विनय विवेक साहस सुकृति सुसत्यव्रत राम भरोसे एक ।। काम क्रोध मद लोभ की जौ लौं मन में खान । तौ लौं पण्डित मूरखौं तुलसी एक समान ।।

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दया धर्म का मूल है , पाप मूल अभिमान । तुलसी दया न छांड़िए , जब लग घट में प्राण ॥ काम क्रोध मद लोभ की जौ लौं मन में खान । तौ लौं पण्डित मूरखौं तुलसी एक समान ।। सुरनर मुनि कोऊ नहीं , जेहि न मोह माया प्रबल । अस विचारी मन माहीं , भजिय महा मायापतिहीं ॥ आवत ही हरषै नहीं नैनन नहीं सनेह । तुलसी तहां न जाइये कंचन बरसे मेह ।।

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देव दनुज मुनि नाग मनुज सब माया विवश बिचारे । तिनके हाथ दास तुलसी प्रभु कहा अपनपो हारे ॥ बिना तेज के पुरुष की अवशि अवज्ञा होय । आगि बुझे ज्यों राख की आप छुवै सब कोय ।।

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वृन्द

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करत-करत अभ्यास ते जड ़ मति होत सुजान । रसरी आवत जात तें सिल पर परत निसान ॥ जो पावै अति उच्च पद ताको पतन निदान । ज्यौं तपि-तपि मध्यान्ह लौं अस्तु होतु है भान ॥ जो जाको गुन जानही सो तिहि आदर देत । कोकिल अंबहि लेत है काग निबौरी लेत ॥ मनभावन के मिलन के सुख को नहिंन छोर । बोलि उठै नचि नचि उठै मोर सुनत घन घोर ॥

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सरसुति के भंडार की बडी अपूरब बात । ज्यौं खरचै त्यौं-त्यौं बढै बिन खरचे घटि जात ॥ निरस बात सोई सरस जहाँ होय हिय हेत । गारी प्यारी लगै ज्यों-ज्यों समधिन देत ॥ ऊँचे बैठे ना लहैं गुन बिन बड ़ पन कोइ । बैठो देवल सिखर पर बायस गरुड ़ न होइ ॥ उद्यम कबहुँ न छोडिए पर आसा के मोद । गागरि कैसे फोरिये उनयो देखि पयोद ॥

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कुल कपूत जान्यो परै लखि-सुभ लच्छन गात । होनहार बिरवान के होत चीकने पात ॥ मोह महा तम रहत है जौ लौं ग्यान न होत । कहा महा-तम रहि सकै उदित भए उद्योत ॥

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रहीम

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रहीमन धागा प्रम को, मत तोड़ो चटकाय टूटे से फिर ना मिले, मिले गांठ परि जाय । गही सरनागति राम की, भवसागर की नाव ‘रहीमन’ जगत - उधार को, और न कोऊ उपाय । जो गरीब तों हित करें, धनी ‘रहीम’ ते लोग कहा सुदामा बापुरो, कृष्ण-मिताई-जोग । रहीमन बात अगम्य की, कहिन सुनन की नाहिं जे जानत ते कहत नाहिं, कहत ते जानत नाहिं ।

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जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकत कुसंग । चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटे रहत भुजंग ॥ बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय । जो दिल खोजा आपना, मुझसा बुरा न कोय ॥ बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर । पंथी को छाया नहीं, फल लागे अति दूर ॥ मीठा सब से बोलिए, फैले सुख चहुँ ओरे ! वाशिकर्ण है मंत्र येही, ताज दे वचन कठोर ॥

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बिगरी बात बनै नहीं, लाख करो किन कोय रहिमन फाटे दूध को, मथे न माखन होय । रहिमन अच्चे नरन सों, बैर भो ना प्रति काटे चाटे स्वान के, दोउ भांति विपरीत ।

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सूर

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स्माप्त धन्यवाद !

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अभिषेक मल्लिक नवीं ‘ब’

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